हम जब निकले घर से पहली बार, संग सगं चलती थी किताबें जन्मदिन के साथ बदलती थी कक्षा, और बदलती थी किताबें हम उनके बैगर, वो हमारे बैगर, हम थे अधूरे और अधूरी थी किताबें आज पढ़ लिया जब पाठ हमने पूरा, तो जाना ज़िन्दगी में कितनी ज़रूरी थी किताबें हो लड़ाई, झगड़ा या प्यार, मोहब्बत, सब हालातों में काम आती थी किताबें प्यार में छुपाते थे गुलाब हम उनमें, झगड़े में फाड़ दी जाती थी किताबें सच को बतलाना, झूठ को छुपाना, करती सब काम वो ज़रिया थी किताबें महके और बहके थे हम जिनके साये में, फुलवारी और बग़ीया थी किताबें रखता था अकसर सीने पर मैं, मेरे साथ सोया करती थी किताबें होती थी दुशमन कभी तो दोस्त कभी, जाने क्या क्या हुआ करती थी किताबें घर घर की हसरत और ज़रूरत, अलमारियों में सज़ा करती थी किताबें बस देने का ही काम किया ज़िन्दगी भर, दिल जीत लिया करती थी किताबें आज जितना मैं हूँ मजबूर, उतनी ही मजबूर हैं किताबें सब कुछ है आज मेरे पास, पर बहुत दूर हैं किताबें, बहुत दूर हैं किताबें चलो आज फिर किताब पढ़ते हैं।