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'किताबें...' - विकास बंसल

हम जब निकले घर से पहली बार, संग सगं चलती थी किताबें जन्मदिन के साथ बदलती थी कक्षा, और बदलती थी किताबें हम उनके बैगर, वो हमारे बैगर, हम थे अधूरे और अधूरी थी किताबें आज पढ़ लिया जब पाठ हमने पूरा, तो जाना ज़िन्दगी में कितनी ज़रूरी थी किताबें हो लड़ाई, झगड़ा या प्यार, मोहब्बत, सब हालातों में काम आती थी किताबें प्यार में छुपाते थे गुलाब हम उनमें, झगड़े में फाड़ दी जाती थी किताबें सच को बतलाना, झूठ को छुपाना, करती सब काम वो ज़रिया थी किताबें महके और ब
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