ख़ुद में रह कर ख़ुद के साथ वक़्त बिताना चाहता हूँ ख़ुद को नहीं पहचानता मैं, परिचय करवाना चाहता हूँ यहाँ घूमा वहाँ घूमा कभी इसके साथ तो कभी उसके साथ ख़ुद के साथ ख़ुद मैं कहीं बाहर घूमने जाना चाहता हूँ रोशन कर दिया ज़माने को जला जला कर दीये मैंने एक दीया अब मैं अपने अंदर भी आज जलाना चाहता हूँ महकाने को जिस्म अपना जाने किये क्या क्या जत्न मिल जाए कोई इत्र ऐसा की अब मैं रूह महकाना चाहता हूँ माहीर हूँ मैं लोगों के समझाने के लिये और मनाने के लिये मान जाऊँ मैं ख़ुद से जो तो अब ख़ुद को समझाना चाहता हूँ ये बना वो बना जाने क्या बना ज़माने और ज़िन्दगी के लिए दे दे मौक़ा मेरे मौला अब मुझे मैं इंसान बन जाना चाहता हूँ ख़ुद में रह कर ख़ुद के साथ वक़्त बिताना चाहता हूँ ख़ुद को नहीं पहचानता मैं, परिचय करवाना चाहता हूँ