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ख़ामोश हैं पत्थर कुछ बोल नहीं पाते

ख़ामोश हैं पत्थर कुछ बोल नहीं पाते राज दफ़्न है जो सीने में खोल नहीं पाते आज अपने पत्थर होने पर वो शर्मिंदा हैं अफ़सोस उन्हें क्यों वो अब ज़िंदा हैं आज क्या कर रहा इंसान उनके सहारे जाने कितने बार वो गये बेवजह मारे ये कैसी हैवानियत ये कैसा जुनून रोते हैं वो जब लग जाता उनपे ख़ून दिशा देता जब कोई ख़ुद को रोक नहीं पाते ख़ामोश हैं पत्थर कुछ बोल नहीं पाते राज दफ़्न है जो सीने में खोल नह
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