ख़ामोश हैं पत्थर कुछ बोल नहीं पाते
राज दफ़्न है जो सीने में खोल नहीं पाते
आज अपने पत्थर होने पर वो शर्मिंदा हैं
अफ़सोस उन्हें क्यों वो अब ज़िंदा हैं
आज क्या कर रहा इंसान उनके सहारे
जाने कितने बार वो गये बेवजह मारे
ये कैसी हैवानियत ये कैसा जुनून
रोते हैं वो जब लग जाता उनपे ख़ून
दिशा देता जब कोई ख़ुद को रोक नहीं पाते
ख़ामोश हैं पत्थर कुछ बोल नहीं पाते
राज दफ़्न है जो सीने में खोल नहीं पाते
छू लिया था प्रभु राम ने तब वो इतराये थे
खुश थे जब पवन पुत्र उठा के लाये थे
बना के भगवान उन्हें पूजता है इंसान
करता वार वो ही जब बन जाता हैवान
पत्थर के वजूद पर ख़तरा मँडरा रहा है
पत्थर सोच के परेशाँ क्यों उन्हें बरसा रहा है
ज़रूरत होती उनकी तो ख़ुद को छुपा नहीं पाते
ख़ामोश हैं पत्थर कुछ बोल नहीं पाते
राज दफ़्न है जो सीने में खोल नहीं पाते
पत्थर को दर्द है पर इंसान को नहीं?