जिसमें चाबी भरते भगवान
आदमी चलता फिरता वो खिलौना है
कभी काँटों के पथ पे चलता
तो कभी वो स्वप्न एक सलौना है
दिन रात कटाने के लिये पहर
चाँद की चादर मिट्टी का बिछौना है
पल पल हाथ से निकल जाते पल
पल में सुख पल में दुख पाना खोना है
अपने होने का अहसास कराता वो
कोई जाने पितल और कोई सोना है
नतमसतक हो जाता भगवान के आगे
क्याेंकी उसके आगे ये बौना है
जिसमें चाबी भरते भगवान
आदमी चलता फिरता वो खिलौना है