गुज़ार दी ज़िन्दगी हमने बस एक चाहत लिये जाने कब होंगे दीदार उनके और वो हमारे मेहमान कब होंगे कर रखा है परेशान उनकी यादों ने इस क़दर कि पूछो मत करूँ मैं याद उनको तो वो हिचकियों से परेशान कब होंगे बहुत फैल चुकी है मज़हबी लड़ाई सोचूँ तो डर लगता है इंसान से फ़र्क़ इंसान का, वो एक हिन्दु मुसलमान कब होंगे बहुत हैं फ़ासले दिलों में भले ही सामने न बताता कोई ये बता ख़त्म ये फ़ासले आख़िर तेरे मेरे दरम्यान कब होंगे जिसे देखो बस ताक़ लगाये बैठा है भूखी चीलों की तरह कब समझेंगे ये बात मेरी इनके पाक ईमान कब होंगे बहुत होते हैं वादे यहाँ पूरा करता नहीं कोई वादा अपना हो जायें सपने पूरे सबके वो नायाब फ़रमान कब होंगे