बस यूँही ........ वादे पे वादा वो लेती रही और मैं निभाता रहा बस यूँही ....... वो पास कभी नहीं आई मेरे और मैं सबसे दूर जाता रहा बस यूँही वैसे तो मैं आशिक़ था उसका ज़माना मजनूं कहके बुलाता रहा बस यूँही शब्द ये सारे उसी के हैं कहाँ मेरे मैं तो बना के ग़ज़ल सुनाता रहा बस यूँही लकीरों में क्या लिखा मालूम था फिर भी क़िस्मत अपनी आज़माता रहा बस यूँही वादे पे वादा वो लेती रही और मैं निभाता रहा बस यूँही ....... बस यूँही बस यूँही .........