बचता फिरता बारीश से मैं आज क्यों? कभी मैं बारीश में भीग जाना चाहता था लगता है डर मुझे आज करने में मौज कभी मैं रोज मस्ती में डूब जाना चाहता था दोस्त, कैसे दोस्त, कौन दोस्त, याद नहीं कभी मैं पूरा दिन दोस्तों के साथ बिताना चाहता था आज डरता हूँ करने से कोई भी वादा मैं कभी मैं करकर हर वादा निभाना चाहता था वो कमाई के लिये जाना घर से बहार और डरना कभी मैं घर छोड़कर भाग जाना चाहता था आज सब कुछ है मेरे पास पर समय नहीं कभी मैं समय से आगे निकल जाना चाहता था आज दिवाना हो गया चंद कागज के टुकड़ों का कभी चिल्लरों से ख़ुशियाँ ख़रीद लाना चाहता था आज हो गया बड़ा तो करता याद बचपन कभी मैं बहुत जल्दी बड़ा हो जाना चाहता था मिल गया सब कुछ फिर भी ख़ाली हाथ हूँ क्या सही में मैं ये सब कुछ पाना चाहता था बचता फिरता बारीश से मैं आज क्यों? कभी मैं बारीश में भीग जाना चाहता था