आज कोई मेरे नखरे नहीं उठाता
रूठ जाऊँ तो मुझे कोई नहीं मनाता
छोड़ दूँ घर जो तो कोई नहीं ढूंढने आता
गलतीयों पर मेरी कोई मुझे नहीं सुनाता
वो छड़ी की मार डंडे का डर नहीं सताता
पड़े न हमें डाँट कोई अपने पीछे नहीं छुपाता
बात बात में करके प्यार कोई नहीं रूलाता
लगे न नजर कोई काला टिका नहीं लगाता
पक चुका हूँ बहुत कच्चा था तो अच्छा था
क्यों बड़ा हुआ मैं, बच्चा था तो अच्छा था
आज आज क्यों आया ये सवाल पूछता हूँ मैं
ज़िन्दगी जैसे पहेली कोई रोज़ बूझता हूँ मैं
काग़ज़ के टुकड़ों का जैसे ग़ुलाम हो गया
समय नहीं भाई कहते सब मुझे, बदनाम हो गया
मोबाईल की बैटरी की सबसे ज़्यादा चिंता रहती
मतलब का यार हूँ मैं बस अब ये दुनियाँ कहती
दोस्त, यार, रिशते नाते, क्या सब मतलब नहीं
समझदार हूँ पर नासमझ, समझूँ न ग़लत सही
झूठ हो चुका हूँ बहुत सच्चा था तो अच्छा था
क्यों बड़ा हुआ मैं, बच्चा था तो अच्छा था
वो बचपन था अनमोल क़ीमत आज जाना हूँ मैं
पहचान लिया लोगों ने खुद को आज पहचाना हूँ मैं
जो हमेशा रहता था तैयार आज बस बहाना हूँ मैं
रहता परेशान हर पल भूल गया मुसकरना हूँ मै
समय से बँधा बँधा एक टट्टू खिसियाना हूँ मैं
देखता मुड़कर पीछे तो जैसे गुज़रा जमाना हूँ मैं
बचपन की अनमोल देन जवानी का नज़राना हूँ मैं
जवान हूँ, परेशान हूँ, नादान बचपन का दिवाना हूँ मैं
लफ़ंगा हो चुका हूँ बहुत लुचा था तो अच्छा था
क्यों बड़ा हुआ मैं, बच्चा था तो अच्छा था