आदमी बंदर है रोज़ जीने के लिये
करतब नया दिखाना पड़ता है
हँसता नहीं गुमसुम बैठा रहता
हँसाने के लिये उसे गुदगुदाना पड़ता है
ख़ुशी जो कभी मिलती तो ख़ुश रहने के लिये
उसे अपनों से छुपाना पड़ता है
रिश्ते नाते मजबुरी हैं निभाने के लिये
दोस्ती को उम्र भर निभाना पड़ता है
बेक़ाबू साँसों की रफ़्तार जीने के लिये
एक एक साँस को बचाना पड़ता है
हालातों के हाथों मजबूर बचने के लिये
शर्म की चादर को बिछाना पड़ता है
पेट की आग बुझती नहीं चाहे करे कुछ
रोज सुबह सफ़र पर निकल जाना पडता है