इतने तो वस्ल के मंजर ना थे..
जितनी तेरी यादो की रानाई है..
आके जरा देख मे वो ही हूँ
वो ही दिल है, वो ही तन्हाई है
मैंने तेरे इंतजार मे आज फिर
खून-ए -जिगर से शमा जलाई है
दिल के इस वीरान किनारे से
फिर तेरी यादो की मौज टकराई है
कभी आकर हाल पूछ तू भी दीवाने का
इस बेरुखी की कसम क्यों तूने खायी है
इश्क़ से ताउम्र ड़र लगता रहा
मेरी वहशत उसी मुक़ाम पर आज मुझे लायी है
दिल तुझे चाहता है अब भी बदस्तूर
ना भूलने की इसने कसम खायी है
बोलकर झूठ तुझसे ना मैं सो पाता हूँ
सच बता कल रात क्या तुझे नींद आयी है
जिसको अज़ाब-ए -हिज्र कहते है ऐसी कई राते
हमने आँखो - आँखो मे बितायी है
-धुआँ
वस्ल – मिलन
मंजर - फूलों का गुच्छा, मोती
रानाई – सुंदरता
खून-ए –जिगर - दिल का खून
वहशत – पागलपन
अज़ाब-ए –हिज्र - जुदाई की सजा
