यह एक प्रयास है सुश्री इन्द्राणी वर्मा जी को बेहद खूबसूरत ग़ज़ल 

" वो अजीब शख़्स था भीड़ में... " को आगे बढ़ाने का 



गुस्ताखी के लिए माफ़ी के साथ ...


वो अजीब शख़्स था भीड़ में जो नज़र में ऐसे उतर गया 

जिसे देख कर मेरे होठ पर मेरा अपना शेर ठहर गया .....

- इन्द्राणी वर्मा


यहाँ से :- 



जो हाथ उठे तो वो दुआ हुआ

झुका जो सर तो वो खुदा हुआ

वो शामिल हुआ ऐसे हर शाम में

कि सुबह का सूरज निखर गया


मेरी यादों से वो जुड़ा रहा

मेरे साथ हर पल खड़ा रहा

वो शख़्स जब मुझ से जुदा हुआ

मैं कांच जैसा बिखर गया


वो ऐसे मेरे साथ चला

कि चले हों सारे रास्ते

वो जब खुद -ब- खुद रुक गया

तो ये सफ़र मानो ठहर गया



कुछ ऐसे वो ख़फ़ा हुआ

कि अपने आप जुदा हुआ

वो जो मुझमें था घुला मिला

मेरे आँसुओं में बिखर गया



उसके प्यार में जल गया

उसकी नफरतों से बुझ गया

कुछ चिंगारी दिल में बची रही

में सुलगते - सुलगते

"धुआँ " हुआ


- धुआँ