उम्मीद भी अब कोई दरवाज़ा नहीं खड़खड़ाती हैहर दुआ भी कतरा के मुझ से गुजर जाती हैजब से रुख़्सत हुआ है वो शख़्स मुझ सेमेरी मुस्कान भी लबो पर आते हुए घबराती है
उम्मीद भी अब कोई दरवाज़ा नहीं खड़खड़ाती हैहर दुआ भी कतरा के मुझ से गुजर जाती है
जब से रुख़्सत हुआ है वो शख़्स मुझ सेमेरी मुस्कान भी लबो पर आते हुए घबराती है