फिर याद तेरी आयी फिर नम हुई पलकें
एक समुंदर फिर आँखो में उतर आया है
कौन है ये जो पुकारता मुझको यूँ बे-सबब
मैं ख़ुद तो नहीं हूँ तो क्या मेरा साया है
मिलन के इंतज़ार में दिन कुछ ऐसे हम बिता रहे
समय जैसे थम गया हर पल में युग समाया है
तेरे शोख़ लबों पर आ थमे जो एक बूँद चूम लूँ
मृगतृष्णा में भटक रहा ना चैन कहीं भी पाया है
मैं उड़ चला सवार हो एक धवल अश्व की पीठ पर
लगाम जिसकी तेरे हाथ में ये प्रेम कैसी माया है
-धुआँ


