"मोह" ये शब्द अपने आप में एक सम्पूर्ण ग्रन्थ है
ये भाव आपको फर्श से अर्श तक ले भी जा सकता है
और आपको अर्श से फर्श तक जब पटकता है तो आपकी कमर ही नहीं टूटती.. आप अपने आप में टूट जाते हो
इसलिए ये "मोह" या तो किसी से करो ही नहीं और अगर करो तो इसके अनंत प्रवाह में बहने के लिए तैयार रहो
फिर चाहे आप का अस्तित्व इसकी लहर की भेट चढ़ जाए या फिर आप किनारा पर लो
"मोह" का ये ही जादू है


