ऐसा क्या लिखूँ जो उसे पसंद आए...


क्या प्रेम का कोई गीत लिखूँ 

या नज़्म में अपनी प्रीत कहूँ


छेड़ूँ फ़साना क्या उसके गुलाबी गालो का 

या फिर जिक्र करूँ उन रेशमी बालो का


उन झील सी आँखो की कुछ बात करूँ

या उन मखमली हाथों पर अपना हाथ रखूँ


कहूँ उसको कि ज़माने भर में अब आग लगे

सब से छुप के चलो हम भाग चले


कुछ ऐसा जिसे पढ़ कर वो शरमाए

अपने होठ के किनारे को दांतो में दबाये


ऊँगली में अंगूठी घुमाते घुमाते कुछ सोचे

तो उसके ख़यालों में मेरा चेहरा उभर आए


कुछ ऐसा जो उसके ज़ेहन में रह जाए

ऐसा क्या लिखूँ जो उसे पसंद आए


-धुआँ