अनेको पुत्र की जन्म दात्री है ये प्रकर्ति , कुछ कबूतर से शांति प्रिय, कुछ बाघो से हिंसक, कुछ नदी से शांत, कुछ सागर से भड़कते हुए, कुछ सर्प से विषेले, कुछ बर्फ से ठन्डे.... फिर हुई वो अकाट्य भूल, जिसे नाम मिला मानव का.. जिसके स्वार्थी जीवन का एकमात्र लक्ष्य संचय और दोहन, जिसकी दानावल सी भूख छा गयी काला धुँआ बन कर भूमंडल पर... वो साधन संपन्न टूट पड़ा समस्त जीवो पर, उनके घर पे धावा बोल नोच लिया उनका मांस, पी गया उनके हिस्से का पानी, दूषित कर दी उनकी वायु... पर इतने से ही कहाँ मिटने वाली थी उस कपूत की प्यास... माँ के दामन को दूषित किया, रसायनों से..काट दिया आँचल(ओजोन layer), चूस गया लहू, कर दिया वस्त्र विहीन...

अब तक दम साधे माँ होने का कर्तव्य निभाते

चुप चाप देख रही है प्रकर्ति मानव की ये विनाशलीला..

देखना है कितना बचा  सहन इस माँ के सीने में..

कब लेती है ये चंडी रूप और ज्ञात कराती है

मानव को उसका छुद्र अस्तित्व,

शायद उसका विनाश कर के-

#worldenviornmentday