आज तुम फ़िर मेरे सामने हो, और इस दफ़ा तुम ही हो वो तुम जिसे मैं जानता हूँ बड़े दिनों बाद, पर तुम्हारी आँखे आज भी साफ है एकदम काली स्लेट की तरह , जैसे पहले होती थी और मैं आज भी ख़ामोशी ना पढ़ पाने वाला अनपढ़। मैंने आँखे भींच कर बन्द कर ली हैं क्योंकि मै जनता हूँ कि तुम्हे आता है आंखे पढ़ना और मैं नही चाहता कि तुम आँखे पढ़ो क्योंकि आँखे झूठ बोलती है सफ़ेद झूठ, वो जो कुछ तुमने पढ़ा था बो सब झूठ था ये....ये मुझे मेरे दिमाग ने बताया ।
मैंने बंद आँखों से तुम्हारा हालचाल पूछा और तुमने आज भी दुनिया के रिवाज की तरह मुझसे नही पूछा कि मै कैसा हूँ। अब मैं दुनिया जहाँ की बाते करना चाहता हूँ वो सारी बाते जो मुझसे वास्ता ना रखी हों। मैंने आहिस्ता आहिस्ता आंखे खोल ली है मैं देखता हूँ तुम्हारी तरफ और तभी तुम पूछ लेती हो कि कहो तुम कैसे हो। मैं सारी बातें गले में दबाये जवाब देता हूं ठीक और चाहता हूँ कि तुम वापिस पूछो.... पक्का? और मैं सारी बातें तुम्हें बता दूँ कि कुछ भी ठीक नही है। मैं चाहता हूँ कि तुम आँखें पढ़ ही लो पर तुम उस ठीक हूँ वाले झूठ को सच मान लेती हो। शायद तुमने आंखे नही पढ़ी या पढ़ ली औऱ आँखों ने ही झूठ अजीब है ना बहुत कुछ कहने को होना पर कुछ न कहना और उससे भी ज्यादा अजीब है ये सन्नाटा.... जैसे अभी मैं ये लिख रहा हूँ पर चाहता हूँ कि तुम अभी कुछ बोलोगी और हमारे बीच का सन्नाटा खत्म जो जाएगा पर तुम चुप हो। अब यहाँ सिर्फ सन्नाटा है ना मैं हूँ ना तुम हो और ना हम....।
बोल दिया।


