जो रोशनी न दे वो मजहब हो नही सकता

जो अंधेरों में धकेले वो रब हो नहीं सकता


नफरत की नसीहतों में कैसे जिएगा मजहब

दिखावे का ये दंगल मजहब हो नही सकता


मेरे हर कदम पर उठे तेरी सवालिया नज़र 

बंदी रूहों का शहर मजहब हो नहीं सकता


दरिंदगी की गंदगी में कैसे पनपेगा मजहब

प्रेम न सिखाए वो मजहब हो नहीं सकता


मेरी खुशी में तू शरीक नहीं ये मजहब कैसा

अपने-अपने में सिमटा मजहब हो नहीं सकता


पानी और लहू में जिसे फ़र्क़ न नज़र आये 

पानी सा बहाये लहू वो मज़हब हो नहीं सकता