बस निकल पड़ा…...गाँव अपना छोड़ कर
बिलखते अपनों को और
तरसते रिश्तों को छोड़
सपनों की पोटली लिये
उसे भुनाने चल पड़ा
सूखते तालाब को और
तरसते खेतों को छोड़
पगडंडियां वो गाँव की
और पेड़ो की छाँव छोड
इक सुबह, निकल पड़ा
सपनों के खरीदारों को
तलाशता रहा दर बदर
मंजिलों की तलाश में
नई ज़िन्दगी की आस में
मज़बूर था,निकल पड़ा
न ज़िन्दगी ही ख़ास थ
न उम्मीद थी न आस थी
शहर शहर गली गली
यूँ ही मैं चलता रहा
यूँ ही मैं निकल पड़ा
तिलमिलाती धूप थी
कंपकंपाती सर्दियां भी
कभी भूख से,कभी प्यास से
कभी नींद से लड़ता रहा
फिर भी मैं निकल पड़ा
औरों के सपने सच किये
अपनों का कुछ पता नहीं
कुछ बिके कुछ बिखर गए
कुछ हाथ से फिसल गये
बस उम्मीद थी, निकल पड़ा
बदले शहर की इस हवा में
खामोश गुमशुम ज़िन्दगी
टूटे सपनों के ढेर और
सुनसान सड़कों का सफर
ये मैं कहाँ निकल पड़ा
न जाने ऐसा क्यों लगा
बुला रहा है वो मुझे
अपना गावँ ,अपना घर
जो यूँ ही छोड़ आया था
हैरान, वापस मैं चल पड़ा
शायद वो फसल जी उठे
शायद तालाब फिर भरे
गांव के पेड़ों की छाँव और
अपनी जड़ों की तलाश में
हक़ीक़त से मिलने चल पड़ा
मकान को घर बनाने
सोते रिश्तों को जगाने
कुछ उनकी सुनने,
और कुछ अपनी सुनाने
मैं गांव को निकल पड़ा
न ख्वाहिशों की थी कमी
न टूटे,अधूरे सपनों का डर
हक़ीक़त से आंख चार कमैं खुद की तलाश में
अपने गांव को निकल पड़ा
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