अब बहुत उदास सी हो गईं हैं महफ़िलें सारी

न जाने क्यों अब तेरा ज़िक्र होता नहीं कहीं 


ज़माने ने हाशिये पे शायद बिठा दिया है तुझे

अच्छा हुआ,अब तू किसी और का रहा नहीं


अक्सर महफिलों में तूने अनदेखा किया था मुझे

 मैं तो वहीं हूँ,मगर अब तेरी महफिलें ही नहीं


तेरे हर क़दम,हर राह से वाकिफ़ हैं निगाहें मेरी

तूने  कभी पलट कर मगर हमको देखा ही नहीं


 मेरी खुली बाहों को आज भी इंतज़ार है तेरा

आगोश में आने की मगर कोई शर्त मंज़ूर नहीं