कतार के शुरू में खड़ा वो शख्स
बेचैन था कि कब राशन शुरू हो
क्योंकि कितनी तरकीबों के बाद
राशन कार्ड जुगाड़ा था उसने
लंबी कतार के आखिर में भी
खड़ा था एक और शख्स,शांत ,
निश्चिंत, अपने आप में संतृप्त
उसे पूरी उम्मीद थी राशन की
दोनों ही की जरूरतें थी राशन
किसी तरह ज़िंदा रहने के लिए
पहला वाला उसे बेच के खाएगा
दूसरा ले जाएगा तो चूल्हा जलेगा
जिंदगी दोनों की ही मुश्किल थी
झूठ की भी और सच की भी
जूठ को झूठ छिपाने की मुश्किल
सच को जिंदगी के सच की मुश्किल
सच मगर संतृप्त था, संतुष्ट था
और जूठ कुछ विचलित सा था
राशन की कतार के दो छोर
जिंदगी का दर्शन समेटे बैठे थे

