दूसरों में रावण की झलक दिखती है हरदम हमें
खुद के रावण से मगर,कभी गुफ्तगू नहीं होती
मुद्दतें हुई रावण को गली गली जलाते हुए
सीता की बदनसीबी मगर कहीं कम नहीं होती
हम् ही में है राम और हमी में है रावण भी
दोनों की सही से मगर पहचान नहीं होती
ये फैसला भी तेरा, और ये मुकद्दर भी तेरा
कितना राम है तू और कितना रावण है तेरा
बस कभी राम बन सारी मर्यादाओं को निभा
और कभी मर्यादाएं छोड़,सीता का साथ निभा

