आपदा की इस घड़ी में अपने आप से कुछ सवाल पूछने की जरूरत है हमें,
क्या हम खुद जिम्मेदार हैं इस स्थिति के लिए
क्या हम कुछ बेहतर कर सकते हैं अपने लिए , अपने समाज के लिए अपने लोगों के लिए,
ऐसी ही एक छोटी सी कोशिश है मेरी इस कविता के माध्यम से, उम्मीद है आप को ये पसंद आए
सारे दिए बुझाकर मैंने
पूछा रात की स्याही से
मासूम रोशनी को ऐसे
क्यों निगल गई बेहयाई से
रात ने घूर के देखा मुझको
काली आंखों की गहराई से
बोली, अंधियारा फ़ितरत है मेरी
मैं तो सजती हूँ स्याही से
तेरा काम है रोशन करना
तू क्यों डरता है परछाई से
रोशन कर दिल को, दुनिया को
तू भागे क्यों है आशनाई से
रात की बात की गठरी बांधी
उठा मादकता की अंगड़ाई से
निकला दुनियां को राह दिखाने
ज़िंदादिल रहनुमाई से
हम खुद ही तो राहु बनते हैं
लील जाते हैं खुद की रोशनी
चलो फलसफे लिखें नए हम
अब दिल की रोशनाई से
चलो चंद्रमा बनकर अब हम
राह दिखाएँ राहु को भी
दें दुनिया को दिल की रोशनी
भर दें आशनाई से

