वो पूछते हैं गीतों में ये दर्द कहाँ से लाता हूँ
कैसे उन्हें बताऊं ,मैं ये दास्ताँ कैसे बनाता हूँ
उनसे ही चुराए लम्हों की माला पिरो देता हूँँ
उनके ही जज़्बातों से कोई दास्ताँ बुन लेता हूँ।
कुछ ख्वाब उनके,कुछ अपने संजो लेता हूँ।
थोड़ी सच्ची थोड़ी झूठी दास्ताँ बना लेता हूँ।
मेरी दास्तान-ऐ-दर्द में वो खुद का अक्स पाते हैं
उसे मेरा दर्द समझ अपना अक्सर भूल जाते हैं

