कोई और क्यों ये तय करे
मेरा गम हो क्या खुशी हो क्या
क्यों न मैं खुद ही बनूँ
अपनी रज़ा, अपना ख़ुदा
खुद ही मैं साहिल बनूँ
अपनी दरिया को दिशा दूँ
खुद ही पुरवईया बनूँ
ख़ुद के खयालों को हवा दूँ
फ़िक्र बेज़ा ज़िन्दगी
कौन करता है यहाँ
क्यों न अपनी ज़िंदगी को
मैं खुद ही इक नई उषा दूँ
जुड़कर भला अपनी ज़मीं से
कौन रहता है यहाँ,
क्यों न इस मिट्टी में अपनी
मैं कोई रिश्ता गूंथ लूँ

