लब्ज़ ठहरते नहीं  आजकल लबों पे मेरे

जाने क्यों गजल कुछ नाराज हो गई मुझसे


अशआर भी आते नहीं अब बुलाने से मेरे

मौशिकी भी अब मुंह फेर के बैठी है मुझसे


कहते हैं आशिक़ी में निखर उठती है गजल

आशिकी भी तो मुंह फुलाए बैठी है मुझसे


नाराज जिंदगी के वो कुछ हसीन अफसाने

यादों की खिड़की से कुछ बातें करते हैं मुझसे


कलम अब चलती नहीं,अल्फाज उभरते नहीं

बस पुराने शेर  कभी कभी रुबरू होते हैं मुझसे