टूट कर बिखरा मगर मालूम न थी  टूटने की वजह।

जौहरी की ख्वाहिश थी मुझे कुछ और तराशा जाये ।।


मुझे तो  गुमां भी नहीं था जौहरी के ख्वाबों का ।

खुद को अधूरा पाया तो दर्द का अहसास हुआ।। 


 न जौहरी ने पूछा न ज़माने ने कभी ज़िक्र किया ,I

पूछते तो बताता क़ि मुझे  कितना तराशा जाये ।।


जौहरी ने माथा पीटा,ज़माने को भी अहसास हुआ ।

मेरा बिखरा वज़ूद मगर इक  नाम को तरसता रहा  ।।


मुझसे अनमोल हीरा निखरने की  उम्मीद थी मगर 

 बेहतरी के लालच में मेरा वज़ूद बिखर के रह गया