कंटीली पथरीली राह ये,
धूप की छांव,पांव के छाले
ये राह तुमने चली नहीं,
तुम्हें इस राह का क्या पता
खुशियों की महफिल में भी
दबे पांव दर्द की दस्तक
इस दर्द से तुम गुजरे नहीं,
तुम्हें इस दर्द का क्या पता
दर्द से यूं उलझते कभी,
अपनों से यूं बिछड़ते कभी
जो मंज़र देखा ही नहीं,
तुम्हें उस मंज़र का क्या पता
इस राह के हर मोड़ पर,
मेरा कारवां लुटता ही रहा
पास कुछ बचा नहीं,
तुम्हें मेरी गुरबत का क्या पता
गमों के गहरे समंदर मे,
अपनी सांसों से लड़ता रहा
डूबते उभरते मेरी,उखड़ती
सांसों का तुम्हें क्या पता

