मैं कितना भी मुंतशिर ही सही ज़माने के लिए

तेरी यादों को मगर बहुत सहेज के रखा मैंने


कितनें भी उलझे उलझे हों खयालात मेरे मगर

अपने इश्क़ को बहुत सुलझा कर रखा मैनें


ज़माना कितना ही ख़ुदग़र्ज़ पुकारे मुझे मगर

तेरे लिए तो अपना वज़ूद ही लुटा दिया मैंने


ज़माने की रुसवाई का कोई गम नहीं है मुझे

तेरी जुदाई का गम दिल में दफना दिया मैंने