एक कविता अपने स्वास्थ्य कर्मियों के नाम जिन्होंने अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर औरों की ज़िंदगी बचाने का बीड़ा उठाया है। उन्हें शत शत नमन।



बस अपना ही बोझ उठाने में मुश्किल है ज़रा

सारी दुनिया का मगर बोझ उठाए फिरता हूँ


 ज़ुनून की हद तक है चाहत वतनपरस्ती की 

कांधों पे अपने वतन,का बोझ उठाए फिरता हूँ


अपने ज़ख्मों को यहां लोग छिपाए फिरते हैं

मैं अपने ज़ख्मों को माथे पे सजाए फिरता हूँ


 सबकी है फिक्र मुझे सबसे ही मिलता रहता हूँ

 बस थोड़ा गम है ,अपनों से छिपता फिरता हूँ

ए ज़माने तू ज़िक्र कभी किसी से करे न करे

हर वक़्त तेरी फ़िक्र सीनें मे समाए फिरता हूँ