ज़िन्दगी खुद में है, एक टेढ़ा मेड़ा सा सफर
वो चलाती रही हमें, हम भी बस चलते रहे
रिश्तोँ नातों की खाइयाँ, दूरियां,मजबूरियां
हम मिटाते,पाटते बस रास्ता चलते रहे
हम न समझे,ज़िन्दगी के क़ायदे क़ानून और
वो आगे आगे रही,पीछे पीछे हम चलते रहे
न सवाल ही किया कभी,ना ही कोई जबाब था
हम सर झुकाये, कारवाँ के साथ ही चलते रहे
अब तो ये ख़्वाहिश है अपनी,और ज़िद भी यही
ज़िन्दगी बस अब हमारे ,नक़्शे कदम पर ही रहे
राह भी अब हम चुनें ,और रहनुमा भी खुद ही हों
ज़िन्दगी अब बोझ न हो, ख़ुशनुमा बन कर रहे

