या खुदा तूने आज क्या कहर बरपाया है

कांधा देने भी यहाँ कोई नहीं आया है


जीते जी भी कोई पास फटका नहीं यहाँ

मैयत पे भी यहाँ कोई रोने नहीं आया है


थामे नहीं थमता है मौत का ये सिलसिला 

श्मशान का धुआं भी यहाँ थम नहीं पाया है 


इंसान पर मौत का साया गहराया है इतना 

शायद उठ गया सर से ख़ुदा का साया है 


क़हर से बचा ख़ुदा, ज़िन्दगी लौटा दे फिर से

भीड़ शमशान में,बाज़ारों में कोई नहीं आया है


या खुदा रहम कर वो वक़्त लौटा दे फ़िर से 

जब इंसान गले मिलने से न कभी घबराया है