तेरे हर इम्तिहान के बाद ये उम्मीद कि अब बस ।

तेरा सिलसिला मगर  फिर इक और इम्तिहां तक ।।


ज़िन्दगी न तेरी कहीं हद है न तेरे इम्तहानों की।

मेरी भी ज़िद है जंग की, आखरी इम्तिहां तक ।।


तेरी भी जिद है मुझे गम ए दरिया में डुबोने की ।

मेरी भी जिद है तैरकर दरिया से पार पाने तक ।।