कमबख्त बेगुनाही के लिए,कितने गुनाह कर बैठे
करीब लाने की जिद में, उन्हें कितना दूर कर बैठे
सारे जहां में खूब थे, चर्चे दरियादिली के उनकी
कितने मासूम होते थे ,जाने क्यों कातिल हो बैठे
खुद से दोस्ती अच्छी थी,क्यों वो दिल में आ बैठे
खुश थे अंधेरों में हम, वो क्यों ये उजाला कर बैठे
खुशियां अपने ही दामन में थी, ढूंढते रहे दर बदर
खुशियों के पीछे भागते जिंदगी से ही दगा कर बैठे
