कुछ तेरी नज़र कहती, कुछ मेरी नज़र से बयां होता
बिन बात का झगड़ा यूँ ही बिन बात के सुलझ जाता
चार कदम तुम साथ देते,कदम मिलाकर मैं भी चलता
कितना आसान होता सफर, मंज़िलों का पता मिलता
नज़दीकियां समझे नहीं, दूर हैं तो तुम्हारी चाहत है
समझे अभी भी नहीं, दिल तुमसे क्यों ऐसे आहत है
मैं था खुद से शर्मिंदा, तुम भी अपने से खुश न थे
कुछ मगर कहा नहीं, कमबख्त वक़्त भी रुका नहीं
अपनी अपनी राह पकड़ी,कहीं गुम गए सफर में हम
न मंज़िलों का पता मिला,बस गम ही गम थे हर कदम
उस गलत राह के गलत कदम,गलत दिशा को भूलें हम
आ लौट चलें अपने सफर पर,नई मंज़िलों को छू लें हम
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