प्रेम पाती बांचने को

स्याह होते इस गगन को

नापने को,

चंद्रमा को तू बटोही

पोटली में बांधने को,


जैसे-जैसे रात चढ़ती

नभ में चढ़ते ये सितारे,

खिंच कर एक ओर सारे

जुगनुओं संग नाचने को,


विरह के संताप से

दोनों अकिंचन है बिचारे

आज आओ इस धरा और

इस गगन को पाटने को,


स्वर्ग से गिरती फुहारें

हरित करती मेदिनी को

अनवरत अभिशप्त दोनों

विरह आपस काटने को,


है यही विश्वास हिय में

प्राण जिस के बसे पिय में

लौट तुम आओगे अबके

प्रेम पाती बांचने को!