जननी है, तो जननी का वह
मुख्य भूमिका निभाती है;
लाल की रक्षा करने हेतु
खुद के प्राण लुटाती है।
कितने व्रत-उपवास किए हैं?
कितने दरों पर माथा टेका?
कितनी रातें जाग के काटीं, तब—
बदली शिशु के भाग्य की रेखा!
स्वयं के हिस्से का भी निवाला
मां औलाद को दे देती है;
भूखी रहती है खुशी से,
कतरा-कतरा लुटा देती है।
