चलो माना
जो कहती हो तुम,
कि तुमसे पहले भी
की होगी मैंने
मोहब्बत किसी से,
तुम से पहले भी
किये होंगे मैंने
वादे किसी से,
तुमसे पहले भी
की होगी तारीफ
किन्हीं आँखों की,
किसी और की
आगोश में भी
बिताया होगा वक़्त
चलो माना कि
ये सब सच भी है...
पर सच बताओ
क्या ये सच नहीं है,
कि पहले नहीं लिखी
कभी कोई गज़ल मैंने,
न ही पहले कभी कोई
कविता लिखी थी,
अभी कुछ दिनों से ही
उठ रही है
मोहब्बत की महक
मेरे गीतों से,
अभी कुछ दिनों से ही
नहीं हो पा रहीं हैं
नींदें पूरीं
सच बताओ क्या ये सब
सच नहीं है...
मैं खुद भी
सोचता हूँ कि
मैं क्यों उलझा
रहता हूँ आजकल
रदीफ़ और काफ़ियों
के जोड़तोड़ में,
क्यों देखता रहता हूँ
देर तक
नदी में डूबते हुये
सूरज को मैं,
माँ कहती है
रात भर हँसता
क्यों रहता है
नींद में आजकल...
और आखिरकार मैंने
यह जान लिया है, कि
मैं तुम्हारे प्रेम मे हूँ,
साथ ही तुम्हारे पिछले
सारे आक्षेपों का उत्तर है
आकर्षण...
वो केवल तुम थे
जो एहसासों से
अल्फ़ाज़ों में
बदल गये
और स्याही की
नोंक से
बिखर गये
कागजों पर।
© विदित_नारायण