झूठ की भी सीमाएं होती है

इसकी विमाएं मत खोलो।


षडयंत्रों की तुरपाई पर

इंसानियत को मत झोंको।


जिसे हिमालय का शिखर बनना था

उसे कंकर पत्थर तो मत बनाओ।


सत्ता चाहे तो किसी को फर्श से अर्श पर पहुंचा दे 

पर किसी को अर्श से फर्श पर तो मत गिराओ।


सत्ता प्रशासन के नाम पर 

इस प्रकार अन्याय तो मत झोंको।


जिसे जुगुनू बनके चमकना था

उसे अमावस की अंधेरी रात की छटा मत करो।


जिसे दीपों की खुशियां मनानी थी

उसे अश्रुधारा के मंजर में मत झोंको।


अर्ज बस इतना है जिस का हक है उससे मत छीनो

षडयंत्रों की तो तुरपाई पर इंसानियत को मत झोंको।


सत्ता प्रशासन के नाम पर

इतना तो अन्याय मत करो।।

~विक्की