आज एक बारात चली थी

जीवन की न सौगात पली थी

कोई दूल्हा ना था,घर में चूल्हा ना था

कोई आशा का दीपक सुल्गा ना था

वह घोड़ी या कार बिना चढ़े

मिलन राह का सार बिना पढ़े

उसे मंडप के आसन को जाना 

पर निकल श्मशान को जाना

अंबर के आनन शोकाकुल में

धरा के प्रांगन करुणाजल में

सजाया गया उसके देह को

पर अश्रु बहे मां के नेह को

अंजुरी से जल प्रवाह हो रहा था

फेरे चल रहे घट फूट रो रहा था

अग्नि में कर राख विलिन अनंत हुआ

जीवन की परिभाषा का अंत हुआ

आज एक बारात चली थी

जीवन की न सौगात पली थी।

~विक्की कुमार