या ख़ुदा आदमी ना कर,
मुझको बना दो जानवर!
गुण तो सारे उसके हैं,
जैसे खाना मारकर।
आवाज़ दबाना,
चीरकर या फाड़कर।
जंगली सा भेष धारे,
कपड़ो में घूमें भास्कर।
दिन तो दिन में ना दिखे,
पर रात रहता रात भर।
या ख़ुदा आदमी ना कर,
मुझको बना दो जानवर!
-विक्की आनंद (कैप्टेन)


