रोज ख़्वाब में तेरे शहर तक जाना,

तुमसे मिलना, बाते करना, और फ़िर तुमको छूना,

मानों जीवन का लक्ष्य समापन को है।


हे प्रिये अब जब तुम बिछुड़ चुकी हो,

फ़िर ये ख़्वाब में मेरी क्यों हो!


वही मद्धम मुस्कान तुम्हारी, वही नैन मृगबाणी,

अधरों में लिपटी वही विनाशक चिंगारी,

वही देह है चन्दन जैसा, रूप वही विषधारी,

और उसपर भी तुमने मुझे तनिक न टोका,

अब भी स्वप्न में तुम पर मेरा अधिकार ही क्यों हैं!


हे प्रिये अब जब तुम बिछुड़ चुकी हो,

फ़िर ये ख़्वाब में मेरी क्यों हो?


- विक्की आनन्द (कैप्टेन)