कई आँखों के ख़्वाब समेटे हुए निकलते हैं,
हम गांव से गांव साथ लिए हुए निकलते हैं।
उनके सोच में जो पत्थर देवता है,
उस देवता से ठोकर खाते हुए निकलते हैं।
मरहम तो छोड़िए हाल की भी सूध ना ली,
हम ऐसे चारागर से मिलते हुए निकलते हैं।
जिस सहर की आस में रातों से जंग ली,
अहले सुबह की जीत से हारे हुए निकलते हैं।
-विक्की आनंद (कैप्टेन)
