क्योंकि कलम उगलती नहीं लहू,क्योंकि स्याही से मुमकिन है,बस कालिख पोतना,मैं तुम्हारा नाम लिखकर,फेंकता हूँ स्याही तुमपर,तुम समझना,किसी तलवार धरे योद्धा ने,उतारी है गर्दन तुम्हारी।
क्योंकि कलम उगलती नहीं लहू,
क्योंकि स्याही से मुमकिन है,
बस कालिख पोतना,
मैं तुम्हारा नाम लिखकर,
फेंकता हूँ स्याही तुमपर,
तुम समझना,
किसी तलवार धरे योद्धा ने,
उतारी है गर्दन तुम्हारी।