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लौटते परिन्दे!


क्या हुआ, परिन्दे घर को ख़ाली हाथ जो लौटे!

मुझे तो शौक़ था, छत से परिन्दे लौटते देखूं।

— विक्की आनंद (कैप्टेन)
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