क्या लिखें की रोशनाई चीख़ती है,
रुंधे गले में भी कोई तकलीफ़ सी है,
ज़ेहन में है विवशता और लाचारी भरी है,
हाय!मानवता की टूटती अंतिम कड़ी है!
सभ्यता की यह लड़ाई,
हम यक़ीनन जीत लेंगे,
फ़िर फिज़ाओं में नया,
प्यार का संगीत देंगे,
ज़िन्दगी के रंग में डूबे हुए फ़िर
इश्क़ होगा-मीत होंगे,
और लिखेंगे हम हमारी रोशनाई से,
हमने सदी की वह लड़ाई जीत ली है।
- विक्की आनंद (कैप्टेन)


