हम तर के आएं हैं इस पार,

मेरी बाहों से पूछिए, कोई पतवार नहीं।


तुमसे मिलना ज़रूरी है,

मेरी जान ज़िन्दगी की तलबगार नहीं।


ऐसे वक्त में तूफ़ान उठाना पर सकता है,

मैं हूँ, कि तेरी नज़रों से भी होशियार नहीं।


ऐ मंज़िल मुझसे इम्तिहाँ और न ले,

मैं अपनी नज़रों में अपने ख़्वाबों का गुनाहगार नहीं।



- विक्की आनंद (कैप्टेन)