चलते हुए कुछ कहना है आपसे,
आपको डर लग रहा है ना?
पर आपका ये डर, महज वहम भर है,
डरे हैं बाहर के लोग जो हर रोज तख्ती लेकर चले आते हैं,
वे सब डरे हुए हैं, उन्हें डर रहता है किसी के भूखे सो जाने का,
किसी बच्चे के स्कूल न जा पाने का, किसान के खेतों में फसल सुख जाने का उनके आत्महत्या का ,उन्हें डर रहता है,
उन्हें डर रहता है किसी के रिस्ते टूट जाने का, किसी कि आबरू, अस्मत लूट जाने का, कोई भरोसा टूट जाने का , कोई शहर छूट जाने का, उन्हें डर रहता है,
हौंसला उनका भी टूट जाता है लाठियों के धाक से और ये डर और गहरा हो जाता है,
वो फिर चले आते हैं तख्तियाँ लेकर आवाज और बुलंद करके फैज़ और दुष्यन्त को गाते हैं, अडिग हो जाते हैं।
इसबार उन्हें लाठियां नहीं मिलती इसबार आग लग जाता है , वो आग में जलते हैं और खूब चिल्लाते हैं, इसबार तक डर आतंक में बदल जाता है,
आग बुझने के बाद उनकी लाशें तक चिल्लाती हैं,
कन्धा देने वाले सुनते है और फिर वापिस वो भी चिल्लाते हैं अथाह पीड़ा से पर आक्रोश में,
इसबार उन्हें आतंकी बताकर जेल में रख देते हैं।
पर वो ये फिर नहीं समझ पाते हैं,
डरे हैं बाहर के लोग जो हर रोज तख्ती लेकर चले आते हैं।
चलते हुए कुछ कहना है आपसे,
आपको डर लग रहा है ना?
पर आपका ये डर, महज वहम भर है।
-विक्की आनंद (कैप्टेन)


