कोई घर, कभी कुछ नहीं बोलता,नहीं बोलते हैं,बंद दरवाज़ें और खिड़कियाँ,ज़लज़लों या तूफ़ानों में भी नहीं।पर कराह उठते हैं,खुले हुए दरवाज़ें और खिड़कियाँ,अपने तमाम दर्द समेट कर,हवाओं के रुख़ बदलने भर से ही।
कोई घर, कभी कुछ नहीं बोलता,नहीं बोलते हैं,
बंद दरवाज़ें और खिड़कियाँ,ज़लज़लों या तूफ़ानों में भी नहीं।
पर कराह उठते हैं,खुले हुए दरवाज़ें और खिड़कियाँ,
अपने तमाम दर्द समेट कर,हवाओं के रुख़ बदलने भर से ही।