आज ईर्ष्या की भावना से हर व्यक्तित्व गृसित है,वो ये नहीं जानता कि यह भावना मानव के खुद के जीवन को तहस-नहस करती है, उसके अपने स्वास्थ्य के लिए हानिकर है।आप अपनी मुस्कान से जितना ही इस भाव को छुपाना चाहे पर चढ़ी हुई भृकुटी इसे व्यक्त कर ही देती है।आप इस भावना से इतना गहरा नाता बना लेते हैं कि जब तक आप को कोइ पश्चाताप  हो तब तक आपका शरीर साथ देने से इंकार कर देता है।

जले दिल की पुकार

 

ना चढ़ा भृकुटी तेरा अंग हूं मैं,

जला ही सही, तेरे  संग हूं मैं।।

क्यूं देखें तू बाहर वन,(वातावरण) में,

झांक  ज़रा अन्तर्मन  में।।

ना  छोड़  सकूंगा  मैं तुझको,

चाहे भर लें नफरत जीवन में।।

 

मस्तिष्क में बैठे राक्षस (अहम) को,

क्यूं  पूजे तू  प्रणामो से।।

ना जाने कितने दिल ख़ाक हुए,

तेरे कृत्रिम(बनावटी)भावहीन नेत्र बाणों से।।

 

तू  खोजें  जिसमे मित्र ,सखा,

वो दुष्मन है , नहीं  तुझे पता ।।

ना जाने क्यूं जीते जी उसको ,

ना  करे मुक्त  तू नातों से ।।

 

ना चढ़ा भृकुटी तेरा अंग हूं मैं,

जला ही  सही तेरे संग हूं  मैं।।

ना  जलता  मैं अंगारों  से,

जो जलन हुई, विचारों  से।।

कतरा कतरा  “मैं” ख़ाक हुआ,

तेरे  झूठे अहंकारों  से।।

 

मेरे भीतर की सकारात्मकता को,

ना देख  सका खुली आंखों  से।।

नाकारात्मकता की चादर ओढ़े,

भिड़ गया तू ज़ुल्मी सांसों से।।

 

जब सांस सिसक कर जाने लगी,

तब  पश्चाताप  ना काम आया।।

अब  रोएगा, रुलाएगा,

तू कैसे आंख मिलाएगा,

अपने जन्मदाता भगवानों से

            

                        वेणू Venu